Wednesday, 10 May 2017

(सोना रा थाल निलम रा बाजोट ) महाराणा प्रताप

महाराणा प्रताप  वीर रस कविता व प्रभाव विज्ञान

पाथळ-पिथळ

अरे घास री रोटी हि जद
बन बिलावड़ो ले भाग्यो
नान्हो सो अमरयो चीख पड़यो
राणा रो सोयो दुःख जाग्यो
          हूँ लड़यो घणो हूँ सह्यो घणो
          मेवाड़ी मान बचावण न
          हूँ पाछ नही राखी रण मे
          बैर्यां रो खून बहावण मे
जद याद करूँ हल्दीघाटी
नैणा मे रक्त उतर आव
सुख-दुःख रो साथी चेतकड़ो
सूती सी हुक जगा ज्याव
          पण आज बिलखतो देखूं हूँ
          जद राज कुँवर ने रोटी ताइं
          तो क्षात्र धर्म ने भूलूँ हूँ
          भूलूँ हिंदवाणी चोटी ने
मेला म छपन्न भोग जका
मनवार बिना करता कोनी
सोने रे थाल निलम रा बाजोट
बिना धरता कोनी
           ए हाय जका करता पगल्या
           फूलां री कँवलि सैजा पर
           बे आज रुळ भूखा-तिस्या
           हिन्दवाणे सुरज रा टाबर
आ सोई हुई दो टुक तड़क छाती
राणा री भीम बजत छाती
आँख्या में आँसू भर बोल्या
मैं लिखस्यूं अकबर ने पाती
            पण लिखूँ कियां जद देखे है
            आडावळ ऊंचो हियो लियां
             चितौड़ खड़यो है मगरा म
            विकराळ भूत सी छियां लिया
मैं झूखूं किया, है आण मने
कुळ रा केसरिया बाना री
मैं भूझुं कियां, हूँ सेन्स लपट
आज़ादी रे परवाना री
             पण फेर अमर री सुण बुस्कयाँ
             राना रो हिवड़ो भर आयो
             मैं मानु हूँ दिल्ली तने
             सम्राट संदेशो केवायो
राणा रो कागद बाँच
हुयो अकबर रो सपनो सो सांचो
पण नैण करयो विश्वास नही
जद बाँच-बाँच ने फिर बांच्यो
             के आज हिमालयो पिघळ गयो
             के आज हुयो सुरज सीतळ
             के आज शेर रो शिर डोल्यो
             आ सोच हुयो सम्राट विकळ
बस दूत ईशारा प भाज्या
पिथळ ने तुरंत बुलावण ने
किरणा रो पिथळ आ पुग्यो
ओ सांच भ्रम मिटावण ने
             बी वीर बांकुड़े पिथळ ने
             राजपूती गौरव भारी हो
             बो क्षात्र धर्म रो नेमी हो
             राणा रो प्रेम पुजारी हो
बेरयाँ र मन रो कांटो हो
बिकाणु पूत करारो हो
राठौड़ी रणा म रातो हो
बस सागी तेज दुधारो हो
             आ बात बादशाह जावे हो
             घावां पे लूण लगावण ने
             पिथळ ने तुरंत बुलायो
             राणा री हार बंचावण ने
मैं बाँध लियो है पिथळ
सुण पिंजरे मे जंगली शेर पकड़
ओ देख हाथ रो कागद है
तु देख्यां, फिरसी कियाँ अकड़
             मर डूब चुलु भर पानी म
             बस झूठा गाल बजावे हो
             पन टुटग्यो बी राणा रो
             तु भाट बण्यो बिड़दावे हो
म आज बादशाह धरती रो
मेवाड़ी पाग पगा में है
अब बता किण रजवट र
रजपूती खून रगा में है
            जद पिथळ कागद ले
            देखी राणा री सागी सैनाणी
            नीवं स्यूं धरती खिसक गई
            आँख्या म भर आयो पाणी
पण फेर कही तत्काल सम्भळ
आ बात सफा ही झूठी है
राणा री पाग सदा ऊँची
राणा री आण अटूटी है
            ल्यो हुक्म हुवे तो लिख पूछु
            राणा ने कागद रे खातर
            ले पूछ भल्यांई पिथळ तूं
            आ बात साँची है, बोल्यो अकबर
मैं आज सुणी है नाहरियो
स्याला रे सागे सोवेलो
मैं आज सुनी है सुरजड़ो
बादळ री ओटा खोवेलो
            मैं आज सुनी है चातकड़ो
            धरती रो पाणी पिवेलो
            मैं आज सुणी है हाथीड़ो
            कूकर री जून्यां जीवेलो
मैं आज सुनी है, थांकी कसम
अब रांड हुवेली रजपूती
मैं आज सुणी है, म्यांना मे
तलवार रेवेली अब सूती
            तो म्हारो हिवड़ो काम्पे है
            मूँछयां री मोड़ मरोड़ गई
            पिथळ राणा ने लिख भेज्यो
            आ बात कठे तक गीणा साँची
पिथळ रा आखर पढ़ता ही
राणा री आँख्या लाल हुई
धिकार मने हूँ कायर हूँ
नाहरी री एक दकाल हुई
            हूँ भूख मरुं, हूँ प्यास मरुं
            मेवाड़ धरा आजाद रवै
            हूँ घोर उजाड़ा म भटकूं
            पण मन में माँ री याद रवै
हूँ रजपूतण रो जायो हूँ
रजपूती कर्ज चुकाऊंला
ओ शिश पड़े पण पाग नहीं
दिल्ली रो मान झूकांउला
            पिथळ के क्षमता बादळ री
            जो रोके शूर ऊगाल्यां ने
            सिंहा री हाथळ सह लेव
            बा कूख मिली कद स्याला(सियार) न
धरती रो पाणी पिवे इसी
चातक री चूंच बणी कोनी
कूकर री जुन्या जिवे इसी
हाथी री बात सुणी कोनी
            आ हाथां म तलवार थकां
            कुण राण्ड कवे है रजपूती ने
            म्यानां रे बदले बैरयाँ री
            छात्यां में रेवेली सूती
मेवाड़ धधकतो अंगारो
आँध्या म चम-चम चमकेलो
खड़के री उठती ताना पर
पग-पग पर खांडो खड़खेलो
             राखो थे मूँछयां आंन्टयोड़ी
             रक्त री नदी बहा द्युला
             हूँ अथक लडूंला अकबर स्यूं
             उजड्यो मेवाड़ बसा दयूंला
जद राणा रो संदेशो गयो
पिथळ री छाती दूणी हुई
हिन्दवाणे सुरज चमके हो
अकबर री दुनियां सूनी ही
                          जय महराणा परताप
                           जय राजपूताना
                          जय माँ भवानी।।।।

ये वीर रस कविता पिथल नामक योद्धा ने जो कवि भी थे उन्होंने महाराणा प्रताप के जिवट योद्धा चरित्र को समझने का प्रयास किया है ।  इसका कुछ भाग महाराणा प्रताप के  पत्र लिखने के पहले का हे कुछ बाद का हे । समपूर्ण कविता उन्होंने बाद में ही लिखी होगी । याद रहे कि इसके बाद महाराणा प्रताप ने हल्दी घाटी युद्ध में जीत हासिल की थी ।

No comments:

Post a Comment