Maheshwar / Immortal of Universe
Monday, 3 June 2024
Agnipath Recruitment
Wednesday, 19 October 2022
भगवान श्री विष्णु के 8 वे श्री कृष्ण अवतार लीलाऔ के पृथ्वीगत समय चक्र अवलोकन
Thursday, 30 November 2017
महान बप्पा रावल "काल भोज" के नाम से अरबी लुटेरे थर थर कापते थे
सम्राट महाराणा मैवाड़ श्री बप्पा रावल ( जो "काल भोज" के नाम से जाने जाते थे) जो मैवाड़ राजघराणे के पूवर्ज है , बप्पा रावल (शासनकाल 708-751) सूर्य वंशी सिसोदिया राजवंशमेवाड़ के प्रतापी शासक थे । विशाल रियासत की स्थापना आठवीं शताब्दी में बप्पारावल गुहिल वंश के सिसोदिया राजपूतों ने की थी। महाराणा बप्पा रावल को 'कालभोज' भी कहा जाता है। जनता ने बप्पा रावल के प्रजासंरक्षण, देशरक्षण आदि कामों से प्रभावित होकर ही इन्हे 'बापा' पदवी से विभूषित किया था, पश्चिम भारत के सिंध पश्चिमी कशमीर रावलपिंड़्डी कंधार ईरान आदि पश्चिमी भारत के जगहों पर अरबी लुटेरो के आतंक को रोकने में सफलता हासिल करने से भारतीय राजाओं के महासंघ निर्माण व राजनीतिक मोर्चा निर्माण द्वारा पश्चिमी भारत में सैनिक चौकियों व नये नगर गाँव बसाये गये इनमें सैनिक योद्धा परिवार बसाये गये ये योजना सफल रही व राहत मिली थी जो लगभग 400 वर्ष तक रही । महान काल भोज के समय तमाम छोटे राज्य मिलकर फिर एकता के सूत्र में स्वेच्छा से एक झंडे तले आ चुके थे जो विदेशी हमलावरो को रोक पाये थे । ज्ञात लेखों के अनुसार सन् 728 ई. में बप्पा रावल ने चित्तौड़गढ़ को राजपूताने पर राज्य करने वाले मौरी वंश के अंतिम शासक मान मोरी से दहेज में भैट लिए जाने के बाद गुहिलवंशीय मैवाड़ राज्य की स्थापना की। हालाँकि सम्राट बप्पा रावल की पहले से ही अनेक रानिया थी, मगर राजा मान मोरी ने काल भोज के अरब लुटेरो के खिलाफ सफल अभियान के बाद भविष्य में चितोड़ के नागरिकों व राज्य को शूरवीर के हाथ में देने की योजना के तहत ही बप्पा रावल से संधि व संबंध करके चितोड़ भेंट किया जिसमें बप्पा रावल ने चितोड़ दुर्ग का कीर्ती अमर हुई व भारत माता अगले 400 वर्ष तक सुरक्षित रहा । एक लिंग प्रशशती लेख से यह ज्ञात होता है कि बप्पा रावल की विशेष प्रसिद्धि अरबों से सफल युद्ध करने के कारण हुई। सन् 712 ई. में बप्पा रावल ने मुहम्मद बिन क़ासिम से सिंधु को जीता। अरबों के खिलाफ उसके बाद चारों ओर धावे करने शुरू किए। उन्होंने राजपूतो , व मोरी , सैंधवों, कच्छावा , परमारो , चौहानो , राष्कूट गहड़वालो , व स्थानीय नागरिकों गुर्जरों, जाटो आदि को मिलाकर एक विसाल सैन्य ताकत बनाई । मारवाड़, मालवा, मेवाड़, गुजरात पंजाब सिंध अफगानिस्तान ईरान खुरासान आदि सब भूभागों में उनकी सेनाएँ छा गईं। भारत के कुछ महान् राजा जिनमें विशेष रूप से प्रतिहार सम्राट् नागभट्ट प्रथम का काल 815 इशवी और बप्पा रावल के नाम उल्लेख्यनीय है नागभट्ट प्रथम ने अरबों को पश्चिमी राजस्थान और मालवा से मार भगाया। बापा ने यही कार्य 7 वी इस्वी मे ही सिंध से शुरू कर अफगानिस्तान ईरान उसके आसपास के प्रदेश के लिए किया। चित्तौड़ के राज मान मोरी शायद पहले अरब आक्रमण से जर्जर हो गए उन्होने शूरवीर बप्पा रावल से अपनी पुत्री का विवाह किया व चितोड़ का किला दहेज में भेंट किया । महान बापा ने वह कार्य किया जो मौरी करने में असमर्थ थे, और साथ ही चित्तौड़ से शासन करने लगे । बापा रावल के मुस्लिम देशों पर विजय की अनेक कथाएँ है ईरान खुरासान अफगानिस्तान सिंध आदि जगहों से लुटेरो को भगाया गया । रावल पिंड़ी शहर का नाम बप्पा रावल के नाम से ही है । जहां बहुत बड़ी सेनिक छावनी थी जहां से लुटेरो को भारत में घुसने से पहले ही रोका जाता था शायद इसलिए ही लगभग कई वर्षों तक भारत की रक्षा होती रही लाहोर आदि पुराने किले भी उसी योजना में बने थे । अगले 400 वर्ष तक कालांतर मैं उतार चढ़ाव के बीच केंद्रीय शासन बदलने से भारत में पुनः संकट आने लगे होंगे मगर हम कह सकते हैं कि सम्राट ( बप्पा रावल )काल भोज के नाम से अरब के लुटेरे कांपते थे । तभी तो भारत शताब्दियों तक शुरक्षित रहा । अजमेर आदि स्थान से बप्पा रावल शासन के सोने के सिक्के मिले है जिनपर भगवान शिव जी एकलिगं जी के चित्र त्रिशूल व गाय बछड़े के चित्र अंकित है । वहीं कई शिला लेखों व प्रचिन लिखे लेख भी उनके राज्य के बारे मे बताते हैं । बप्पा रावल के गुरु ऋषि हरित थे जो भगवान शिव के भक्त थे साथ ही गुरु हरित ऋषि के बताये स्थान पर खुदाई करके हजारों किलो सवर्ण राजा बप्पा रावल ने प्राप्त किया था ।
हिंदूधर्म संस्कृति को योगदान के लिए मैवाड़ के सम्राट काल भोज जैसे महान शूरवीर शिव भक्त ( एकलिगं जी) के भक्त राजपूत राजाओं का देश ऋणी रहेगा ।
हजार वर्ष बाद भी हिंदू रक्षको की किर्ती भारतीयों को एकता के सूत्र मे रहने को प्रेरित करती है । संभवत बप्पा रावल भी सातवाहन सम्राट विक्रमादित्य से प्रेरित रहे होंगे जिनके कारण यूनानी लुटेरे भारत से दूर भागते थे । वहीं भारत को एक करने मे महाराणा सांगा मैवाड़, महाराजा मालदेव जोधपुर, महाराजा मान सिंह आमेर, छत्रपति महाराज शिवाजी, गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज, आगे चलकर आधुनिक भारत में सरदार पटेल ने भी यही ऐकिरण करने का प्रयास किया ।
सम्राट बप्पा रावल कि प्रमुख उपलब्धियाँ:
भारत के प्रमुख राजाओं से संधि कर बड़ा सुरक्षा महासंघ बनाया पश्चिमी देशों के लुटेरो के खिलाफ प्राथमिकताओं को पहचानना सीखा महत्त्वपूर्ण आवश्यकता में महासंघ के अध्यक्ष पदाधिकारियों के लिए सर्व सहमति से चुनाव के नियम बनाये
1: भारत की 350 / 400 वर्षो तक पश्चिम सीमा सुरक्षित रही । लुटैरो का खुले में स्थापित नहीं हो सकें छुप कर आते वापस भागाये जाते रहे ।
2: गरीब व लाचार लाखों लोगों को गुलाम बनने से बचाव हुआ ज्ञात हो कि विदेशी लुटेरे कासिम आदि भारत के नागरिकों को गुलाम बनाकर बेचा करते थे बगदाद ईरान तुर्की आदि स्थान पर गुलाम मंडी हुआ करती थी ।
3: हिंदू जैन धर्म की रक्षा व संरक्षण में काल भोज बप्पा रावल के प्रयास अमर रहेंगे ।
4, विदेशी धर्म परिवर्तन को रोक लगी ज्ञात हो कि जबरन धर्म परिवर्तन विदेशी लुटेरो का एक बड़ा षड्यंत्र था । गुलाम मंडी के लिए जबरन दूर के देश विदेशियों को बेचने की प्रथा ईरान तेहरान ईराक बगदाद तुर्क अरबी मंडी आदि ।
5, युवा हिंदू राजाऔ की बाद की पीढ़ियों ने प्रेरणा लेकर समय समय पर राष्ट्र रक्षा युद्ध किये ।
महान सम्राट महाराणा बप्पा रावल "काल भोज " की कीर्ति सदैव याद रखी जाएगी ।
भारतीय युवाओं को अपने महान देश भक्त धर्म संस्कृति संस्कार आधयातमिक रक्षक हिन्दू प्रजा पालक राजाओं सम्राटो के योगदान को पहचानना सीखें ।
जय हिन्द वंदे मातरम
MSR
☉🕉♆⛳☉
2015
Thursday, 6 July 2017
श्री गीतोपनीषद में कितने श्लोक है व हिंदू धर्म ज्ञान संकलन ( 5 )
पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं -
1. युधिष्ठिर 2. भीम 3. अर्जुन
4. नकुल। 5. सहदेव
( इन पांचों के अलावा , महाबली कर्ण भी कुंती के ही पुत्र थे , परन्तु उनकी गिनती पांडवों में नहीं की जाती है )
यहाँ ध्यान रखें कि… पाण्डु के उपरोक्त पाँचों पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन
की माता कुन्ती थीं ……तथा , नकुल और सहदेव की माता माद्री थी ।
वहीँ …. धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र…..
कौरव कहलाए जिनके नाम हैं -
1. दुर्योधन 2. दुःशासन 3. दुःसह
4. दुःशल 5. जलसंघ 6. सम
7. सह 8. विंद 9. अनुविंद
10. दुर्धर्ष 11. सुबाहु। 12. दुषप्रधर्षण
13. दुर्मर्षण। 14. दुर्मुख 15. दुष्कर्ण
16. विकर्ण 17. शल 18. सत्वान
19. सुलोचन 20. चित्र 21. उपचित्र
22. चित्राक्ष 23. चारुचित्र 24. शरासन
25. दुर्मद। 26. दुर्विगाह 27. विवित्सु
28. विकटानन्द 29. ऊर्णनाभ 30. सुनाभ
31. नन्द। 32. उपनन्द 33. चित्रबाण
34. चित्रवर्मा 35. सुवर्मा 36. दुर्विमोचन
37. अयोबाहु 38. महाबाहु 39. चित्रांग 40. चित्रकुण्डल41. भीमवेग 42. भीमबल
43. बालाकि 44. बलवर्धन 45. उग्रायुध
46. सुषेण 47. कुण्डधर 48. महोदर
49. चित्रायुध 50. निषंगी 51. पाशी
52. वृन्दारक 53. दृढ़वर्मा 54. दृढ़क्षत्र
55. सोमकीर्ति 56. अनूदर 57. दढ़संघ 58. जरासंघ 59. सत्यसंघ 60. सद्सुवाक
61. उग्रश्रवा 62. उग्रसेन 63. सेनानी
64. दुष्पराजय 65. अपराजित
66. कुण्डशायी 67. विशालाक्ष
68. दुराधर 69. दृढ़हस्त 70. सुहस्त
71. वातवेग 72. सुवर्च 73. आदित्यकेतु
74. बह्वाशी 75. नागदत्त 76. उग्रशायी
77. कवचि 78. क्रथन। 79. कुण्डी
80. भीमविक्र 81. धनुर्धर 82. वीरबाहु
83. अलोलुप 84. अभय 85. दृढ़कर्मा
86. दृढ़रथाश्रय 87. अनाधृष्य
88. कुण्डभेदी। 89. विरवि
90. चित्रकुण्डल 91. प्रधम
92. अमाप्रमाथि 93. दीर्घरोमा
94. सुवीर्यवान 95. दीर्घबाहु
96. सुजात। 97. कनकध्वज
98. कुण्डाशी 99. विरज
100. युयुत्सु
( इन 100 भाइयों के अलावा कौरवों की एक बहनभी थी… जिसका नाम""दुशाला""था,
जिसका विवाह"जयद्रथ"सेहुआ था )
"श्री मद्-भगवत गीता"के बारे में-
ॐ . किसको किसने सुनाई?
उ.- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई।
ॐ . कब सुनाई?
उ.- आज से लगभग 7 हज़ार साल पहले सुनाई।
ॐ. भगवान ने किस दिन गीता सुनाई?
उ.- रविवार के दिन।
ॐ. कोनसी तिथि को?
उ.- एकादशी
ॐ. कहा सुनाई?
उ.- कुरुक्षेत्र की रणभूमि में।
ॐ. कितनी देर में सुनाई?
उ.- लगभग 45 मिनट में
ॐ. क्यू सुनाई?
उ.- कर्त्तव्य से भटके हुए अर्जुन को कर्त्तव्य सिखाने के लिए और आने वाली पीढियों को धर्म-ज्ञान सिखाने के लिए।
ॐ. कितने अध्याय है?
उ.- कुल 18 अध्याय
ॐ. कितने श्लोक है?
उ.- 700 श्लोक
*ॐ. गीता में क्या-क्या बताया गया है?
उ.- ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है।
ॐ. गीता को अर्जुन के अलावा
और किन किन लोगो ने सुना?
उ.- धृतराष्ट्र एवं संजय ने
ॐ. अर्जुन से पहले गीता का पावन ज्ञान किन्हें मिला था?
उ.- भगवान सूर्यदेव को
ॐ. गीता की गिनती किन धर्म-ग्रंथो में आती है?
उ.- उपनिषदों में
ॐ. गीता किस महाग्रंथ का भाग है....?
उ.- गीता महाभारत के एक अध्याय शांति-पर्व का एक हिस्सा है।
ॐ. गीता का दूसरा नाम क्या है?
उ.- गीतोपनिषद
ॐ. गीता का सार क्या है?
उ.- प्रभु श्रीकृष्ण की शरण लेना
ॐ. गीता में किसने कितने श्लोक कहे है?
उ.- श्रीकृष्ण जी ने- 574
अर्जुन ने- 85
धृतराष्ट्र ने- 1
संजय ने- 40.
अपनी युवा-पीढ़ी को गीता जी के बारे में जानकारी पहुचाने हेतु इसे ज्यादा से ज्यादा शेअर करे। धन्यवाद
अधूरा ज्ञान खतरना होता है।
33 करोड नहीँ 33 कोटी देवी देवता हैँ हिँदू
धर्म मेँ।
कोटि = प्रकार।
देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते है,
कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता।
( हिन्दू धर्म का करने के लिए ये बात उडाई गयी की हिन्दुओ के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो हिन्दू खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता हैं... ???? )
कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मे :-
12 प्रकार हैँ
आदित्य , धाता, मित, आर्यमा,
शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष,
सविता, तवास्था, और विष्णु...!
8 प्रकार हे :-
वासु:, धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।
11 प्रकार है :-
रुद्र: ,हर,बहुरुप, त्रयँबक,
अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी,
रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।
एवँ
दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार।
कुल :- 12+8+11+2=33 कोटी
अगर कभी भगवान् के आगे हाथ जोड़ा है
तो इस जानकारी को अधिक से अधिक
लोगो तक पहुचाएं। ।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
१ हिन्दु हाेने के नाते जानना ज़रूरी है
This is very good information for all of us ... जय श्रीकृष्ण ...
अब आपकी बारी है कि इस जानकारी को आगे बढ़ाएँ ......
अपनी भारत की संस्कृति
को पहचाने.
ज्यादा से ज्यादा
लोगो तक पहुचाये.
खासकर अपने बच्चो को बताए
क्योकि ये बात उन्हें कोई नहीं बताएगा...
📜😇 दो पक्ष-
कृष्ण पक्ष ,
शुक्ल पक्ष !
📜😇 तीन ऋण -
देव ऋण ,
पितृ ऋण ,
ऋषि ऋण !
📜😇 चार युग -
सतयुग ,
त्रेतायुग ,
द्वापरयुग ,
कलियुग !
📜😇 चार धाम -
द्वारिका ,
बद्रीनाथ ,
जगन्नाथ पुरी ,
रामेश्वरम धाम !
📜😇 चारपीठ -
शारदा पीठ ( द्वारिका )
ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम )
गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) ,
शृंगेरीपीठ !
📜😇 चार वेद-
ऋग्वेद ,
अथर्वेद ,
यजुर्वेद ,
सामवेद !
📜😇 चार आश्रम -
ब्रह्मचर्य ,
गृहस्थ ,
वानप्रस्थ ,
संन्यास !
📜😇 चार अंतःकरण -
मन ,
बुद्धि ,
चित्त ,
अहंकार !
📜😇 पञ्च गव्य -
गाय का घी ,
दूध ,
दही ,
गोमूत्र ,
गोबर !
📜😇 पञ्च देव -
गणेश ,
विष्णु ,
शिव ,
देवी ,
सूर्य !
📜😇 पंच तत्त्व -
पृथ्वी ,
जल ,
अग्नि ,
वायु ,
आकाश !
📜😇 छह दर्शन -
वैशेषिक ,
न्याय ,
सांख्य ,
योग ,
पूर्व मिसांसा ,
दक्षिण मिसांसा !
📜😇 सप्त ऋषि -
विश्वामित्र ,
जमदाग्नि ,
भरद्वाज ,
गौतम ,
अत्री ,
वशिष्ठ और कश्यप!
📜😇 सप्त पुरी -
अयोध्या पुरी ,
मथुरा पुरी ,
माया पुरी ( हरिद्वार ) ,
काशी ,
कांची
( शिन कांची - विष्णु कांची ) ,
अवंतिका और
द्वारिका पुरी !
📜😊 आठ योग -
यम ,
नियम ,
आसन ,
प्राणायाम ,
प्रत्याहार ,
धारणा ,
ध्यान एवं
समािध !
📜😇 आठ लक्ष्मी -
आग्घ ,
विद्या ,
सौभाग्य ,
अमृत ,
काम ,
सत्य ,
भोग ,एवं
योग लक्ष्मी !
📜😇 नव दुर्गा --
शैल पुत्री ,
ब्रह्मचारिणी ,
चंद्रघंटा ,
कुष्मांडा ,
स्कंदमाता ,
कात्यायिनी ,
कालरात्रि ,
महागौरी एवं
सिद्धिदात्री !
📜😇 दस दिशाएं -
पूर्व ,
पश्चिम ,
उत्तर ,
दक्षिण ,
ईशान ,
नैऋत्य ,
वायव्य ,
अग्नि
आकाश एवं
पाताल !
📜😇 मुख्य ११ अवतार -
मत्स्य ,
कच्छप ,
वराह ,
नरसिंह ,
वामन ,
परशुराम ,
श्री राम ,
कृष्ण ,
बलराम ,
बुद्ध ,
एवं कल्कि !
📜😇 बारह मास -
चैत्र ,
वैशाख ,
ज्येष्ठ ,
अषाढ ,
श्रावण ,
भाद्रपद ,
अश्विन ,
कार्तिक ,
मार्गशीर्ष ,
पौष ,
माघ ,
फागुन !
📜😇 बारह राशी -
मेष ,
वृषभ ,
मिथुन ,
कर्क ,
सिंह ,
कन्या ,
तुला ,
वृश्चिक ,
धनु ,
मकर ,
कुंभ ,
कन्या !
📜😇 बारह ज्योतिर्लिंग -
सोमनाथ ,
मल्लिकार्जुन ,
महाकाल ,
ओमकारेश्वर ,
बैजनाथ ,
रामेश्वरम ,
विश्वनाथ ,
त्र्यंबकेश्वर ,
केदारनाथ ,
घुष्नेश्वर ,
भीमाशंकर ,
नागेश्वर !
📜😇 पंद्रह तिथियाँ -
प्रतिपदा ,
द्वितीय ,
तृतीय ,
चतुर्थी ,
पंचमी ,
षष्ठी ,
सप्तमी ,
अष्टमी ,
नवमी ,
दशमी ,
एकादशी ,
द्वादशी ,
त्रयोदशी ,
चतुर्दशी ,
पूर्णिमा ,
अमावास्या !
📜😇 स्मृतियां -
मनु ,
विष्णु ,
अत्री ,
हारीत ,
याज्ञवल्क्य ,
उशना ,
अंगीरा ,
यम ,
आपस्तम्ब ,
सर्वत ,
कात्यायन ,
ब्रहस्पति ,
पराशर ,
व्यास ,
शांख्य ,
लिखित ,
दक्ष ,
शातातप ,
वशिष् .
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🔔⛳♨🙏🏻👏🏻🙏🏻♨⛳🔔
( Copy Past for Hinduism Knowledge seekers
हिंदू धर्म विज्ञान संकलन संस्कृति के वैदिक प्रचार प्रसार हेतु Wats App के आये हूए संदेश से आभार )
Dated 7 July 2017
Wednesday, 7 June 2017
राजपूत वंशो के गोत्र वंश
राजपूत वंशो के गोत्र प्रवरादि
राठोड़ वंश के गोत्र-प्रवरादि
गोत्र – गोतमस्य
नदी – सरयू
कुण्ड – सूर्य
क्षेत्र – अयोध्या
पुत्र – उषा
पितृ – सोमसायर
गुरु – वशिष्ठ
पुरोहित – सोह्ड़
कुलदेवी – नागनेचिया माता ( चक्रेश्वरी माता )
नख – दानेसरा
वेद – शुक्ल यजुर्वेद
घोड़ा – दलसिंगार
तलवार – रणथली
माला – रत्न
वंश – इक्ष्वाकु (रघुवंशी) ( सूर्य)
धर्म – सन्यास
बड़ – अक्षय वट
गऊ – कपिला
नगारा – रणजीत
निशान – पंचरंगा
ढोल – भंवर
दमामी – देहधङो
भाट – सिंगेल्या
बारहठ – रोहङिया
शिखा – दाहिनी
गादी – लाहोर
चिन्ह – चील
इष्ट – सीताराम
सम्प्रदाय – रामानुज
पोथी -बडवा,रानीमंगा,कुलगुरु
शाखा – साडा तेरह (13 1/2 )
उपाधि – रणबंका, कमध्व्ज
कछवाह वंश के गोत्र-प्रवरादि
गोत्र – मानव, गोतम
प्रवर – मानव, वशिष्ठ
कुलदेव – श्री राम
कुलदेवी – श्री जमुवाय माता जी
इष्टदेवी – श्री जीणमाता जी
इष्टदेव – श्री गोपीनाथ जी
वेद – सामवेद
शाखा – कोथुमी
नदी – सरयू
वॄक्ष – अखेबड़ (अक्षय वट)
नगारा – रणजीत
निशान – पंचरंगा
छत्र – श्वेत
पक्षी – कबूतर
तिलक – केशर
झाड़ी – खेजड़ी
गुरु – वशिष्ठ
भोजन – सुर्त
गिलास – सुख
पुरोहित – गंगावत, भागीरथ
परमार वंश के गोत्र-प्रवरादि
वंश – अग्निवंश
कुल – सोढा परमार
गोत्र – वशिष्ठ
प्रवर – वशिष्ठ, अत्रि ,साकृति
वेद – यजुर्वेद
उपवेद – धनुर्वेद
शाखा – वाजसनयि
प्रथम राजधानी – उज्जेन (मालवा)
कुलदेवी – सच्चियाय माता
इष्टदेव – सूर्यदेव , महादेव
तलवार – रणतरे
ढाल – हरियण
निशान – केसरी सिंह
ध्वजा – पीला रंग
गढ – आबू
शस्त्र – भाला
गाय – कवली
वृक्ष – कदम्ब,पीपल
नदी – सफरा (क्षिप्रा)
पाघ – पंचरंगी
राजयोगी – भर्तहरी
संत – जाम्भोजी
पक्षी – मयूर
प्रमुख गादी – धार नगरी ( धारा, उज्जैन)
गुहिलोत(सिसोदिया) वंश के गोत्र प्रवरादि
वंश _ सूर्यवंशी,गुहिलवंश,सिसोदिया
गोत्र – वैजवापायन
प्रवर – कच्छ, भुज, मेंष
वेद – यजुर्वेद
शाखा – वाजसनेयी
गुरु – द्लोचन(वशिष्ठ)
ऋषि – हरित
कुलदेवी – बाण माता
कुल देवता – श्री सूर्य नारायण
इष्ट देव – श्री एकलिंगजी
वॄक्ष – खेजड़ी
नदी – सरयू
झंडा – सूर्य युक्त
पुरोहित – पालीवाल
भाट – बागड़ेचा
चारण – सोदा बारहठ
ढोल – मेगजीत
तलवार – अश्वपाल
बंदूक – सिंघल
कटार – दल भंजन
नगारा – बेरीसाल
पक्षी – नील कंठ
निशान – पंच रंगा
निर्वाण – रणजीत
घोड़ा – श्याम कर्ण
तालाब – भोडाला
विरद – चुण्डावत, सारंगदेवोत
घाट – सोरम
ठिकाना – भिंडर
चिन्ह – सूर्य
शाखाए – 24
चौहान वंश के गोत्र-प्रवरादि
वंश – अग्निवंश
वेद – सामवेद
गोत्र – वत्स
वॄक्ष – आशापाल
नदी – सरस्वती
पोलपात – द्सोदी
इष्टदेव – अचलेश्वर महादेव
कुल देवी – आशापुरा ( शाकम्भरी) साम्भर क्षेत्र
नगारा – रणजीत
निशान – पीला
झंडा – सूरज, चांद, कटारी
शाखा – कौथुनी
पुरोहित – सनादय(चन्दोरिया)
भाट – राजोरा
धुणी – सांभर
भेरू – काला भेरव
गढ़ – रणथम्भोर व अजयमेरू
गुरु – वशिष्ठ
तीर्थ – भॄगु क्षेत्र
पक्षी – कपोत
ऋषि – शांडिल्य
नोबत – कालिका
पितृ – लोटजी
प्रणाम – जय आशापुरी
विरद – समरी नरेश
भाटी वंश के गोत्र-प्रवरादि
वंश – चन्द्रवंश
कुल – यदुवंशी
कुलदेवता – लक्ष्मी नाथ जी
कुलदेवी – स्वागिया माता
इष्टदेव – श्री कृष्ण
वेद – यजुर्वेद
गोत्र – अत्रि
छत्र – मेघाडम्भर
ध्वज – भगवा पीला रंग
ढोल – भंवर
नक्कारा – अगजीत
गुरु – रतन नाथ
पुरोहित – पुष्करणा ब्राह्मण
पोलपात – रतनु चारण
नदी – यमुना
वॄक्ष – पीपल
राग – मांड
विरुद – उतर भड किवाड़ भाटी
प्रणाम – जय श्री कृष्ण
सोलंकी वंश का गोत्र-प्रवरादि
वंश – अग्निवंश
गोत्र – वशिष्ठ, भारदाज
प्रवर तीन – भारदाज, बार्हस्पत्य, अंगिरस
वेद – यजुर्वेद
शाखा – मध्यन्दिनी
सूत्र – पारस्कर, ग्रहासूत्र
इष्टदेव – विष्णु
कुलदेवी – चण्डी, काली, खीवज
नदी – सरस्वती
धर्म – वैष्णव
गादी – पाटन
उत्पति – आबू पर्वत
मूल पुरुष – चालुक्य देव
निशान – पीला
राव – लूतापड़ा
घोड़ा – जर्द
ढोली – बहल
शिखापद – दाहिना
दशहरा पूजन – खांडा
झाला वंश के गोत्र-प्रवरादि
वंश – सूर्य वंश
गोत्र – मार्कण्डेय
शाखा – मध्यनी
कुल – मकवान(मकवाणा)
पर्व तीन – अश्व, धमल, नील
कुलदेवी – दुर्गा,मरमरा देवी,शक्तिमाता
इष्टदेव – छत्रभुज महादेव
भेरव – केवडीया
कुलगोर – मशीलीया राव
शाखाए – झाला,राणा
गौङ वंश के गोत्र-प्रवरादि
वंश – सूर्य वंश
गोत्र — भारद्वाज
प्रवर तीन – भारद्वाज,बाईस्पत्य, अंगिरस
वेद – यजुर्वेद
शाखा – वाजसनेयि
सूत्र – पारस्कर
कुलदेवी – महाकाली
इष्टदेव – रुद्रदेव
वॄक्ष – केला
बल्ला वंश के गोत्र-प्रवरादि
वंश – इक्ष्वाकु-सुर्यवंश
गोत्र – कश्यप
प्रवर – कश्यप, अवत्सार, नेधृव
वेद – यजुर्वेद
शाखा – माध्यन्दिनी
आचारसुत्र – गोभिलग्रहासूत्र
गुरु – वशिष्ठ
ऋषि – कुण्डलेश्वर
पितृ – पारियात्र
कुलदेवी – अम्बा, कालिका, चावण्ड
इष्टदेव – शिव
आराध्यदेव – कासब पुत्र सूर्य
मन्त्र – ॐ धृणी सूर्याय नम:
भेरू – काल भेरू
नदी – सरयू
क्षेत्र – बल क्षेत्र
वॄक्ष – अक्षय
प्रणाम – जय श्री राम
दहिया वंश के गोत्र-प्रवरादि
वंश – सूर्य वंश बाद में ऋषि वंश
गोत्र – गोतम
प्रवर – अलो, नील-जल साम
कुल देवी – कैवाय माता
इष्टदेव – भेरू काला
कुल देव – महादेव
कुल क्षेत्र – काशी
राव – चंडिया-एरो
घोड़ा – श्याम कर्ण
नगारा – रणजीत
नदी – गंगा
कुल वृक्ष – नीम और कदम
पोलपात – काछेला चारण
निकास – थानेर गढ
उपाधि – राजा, राणा, रावत
पक्षी – कबूतर
ब्राह्मण – उपाध्याय
तलवार – रण थली
प्रणाम – जय कैवाय माता
गाय – सुर
शगुन – पणिहारी
वेद – यजुर्वेद j
निशान – पंच रंगी
शाखा – वाजसनेयी
भेरव – हर्शनाथ
प्रतिहार वंश के गोत्र-प्रवरादि
वंश – सूर्य वंश
गोत्र – कपिल
वेद – यजुर्वेद
शाखा – वाजस्नेयी
प्रवर – कश्यप, अप्सार, नैधुव
उपवेद – धनुर्वेद
कुल देवी – चामुंडा माता
वर देवी – गाजन माता
कुल देव – विष्णु भगवान
सूत्र – पारासर
शिखा – दाहिनी
कुलगुरु – वशिष्ट
निकास – उत्तर
प्रमुख गादी – भीनमाल, मंडोर,कन्नोज
ध्वज – लाल (सूर्य चिन्ह युक्त)
वॄक्ष – सिरस
पितर – नाहङराव, लूलर गोपालजी
नदी – सरस्वती
तीर्थ – पुष्कर राज
मन्त्र – गायत्री जाप
पक्षी – गरुड़
नगारा – रणजीत
चारण – लालस
ढोली – सोनेलिया लाखणिया विरद – गुजरेश्वर, राणा ,
तंवर (तोमर) वंश के गोत्र-प्रवरादि
वंश – चंद्रवंशी
कुल देवी – चिल्लाय माता
शाखा – मधुनेक,वाजस्नेयी
गोत्र – अत्रि, व्यागर, गागर्य
प्रवर – गागर्य,कौस्तुभ,माडषय
शिखा – दाहिनी
भेरू – गौरा
शस्त्र – खड़ग
ध्वज – पंचरगा
पुरोहित – भिवाल
बारहठ – आपत केदार वंशी
ढोली – रोहतान जात का
स्थान – पाटा मानस सरोवर
कुल वॄक्ष – गुल्लर
प्रणाम – जय गोपाल
निशान – कपि(चील),चन्द्रमा
ढोल – भंवर
नगारा – रणजीत/जय, विजय, अजय
घोड़ा – श्वते
निकास – हस्तिनापुर
प्रमुख गदी – इन्द्रप्रस्थ,दिल्ली
रंग – हरा
नाई – क़ाला
चमार – भारीवाल
शंख – पिचारक
नदी – सरस्वति,तुंगभद्रा
वेद – यजुर्वेद
सवारी – रथ
देवता – शिव
गुरु – सूर्य
उपाधि – जावला नरेश.दिल्लीपति
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