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भगवान श्रीकृष्ण का ऐसा जीवन परिचय जिसे जानकर प्रसन्नता होगी,
ज्योतिष गणना व पौराणिक कथाओं ग्रंथों में उपस्थित तिथियो नक्षत्रो के अनुसंधान संस्थान द्वारा प्रकाशित तथ्यों अनुसार कुल 5057 वर्ष पहले सन् 2022 तक )
⛳☉ भगवान श्रीकृष्ण का वर्णन परिचय 3228 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् में श्रीमुख संवत्सर, भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, बुधवार ( ज्योतिष गणना के अनुसार 21 जुलाई, 3228 B.C.ई पू ) के दिन मथुरा में कंस के कारागार में ठीक मध्य रात्रि माता श्री देवकी जी के गर्भ से जन्म लिया, पिता- यदुवंशी राजा श्री वसुदेव जी है । उसी दिन जल्दी भौर में ही श्री वासुदेव ने नन्द-यशोदा जी के घर गोकुल में छोड़ा । घनघौर वर्षा ऋतु के पश्चात भी देवयोग से मार्ग सुगम होता गया ।
☉⛳मात्र 6 दिन की उम्र में भाद्रपद कृष्ण की चतुर्दशी, 27 जुलाई, मंगलवार, षष्ठी-स्नान के दिन कंस की राक्षसी पूतना का वध कर दिया ।
☉ 1 साल, 5 माह, 20 दिन की उम्र में माघ शुक्ल चतुर्दशी के दिन अन्नप्राशन- संस्कार हुआ ।
☉ 1 साल की आयु त्रिणिवर्त का वध किया ।
☉ 2 वर्ष की आयु में महर्षि गर्गाचार्य ने नामकरण-संस्कार किया ।
☉ 2 वर्ष 6 माह की उम्र में यमलार्जुन (नलकूबर और मणिग्रीव) का उद्धार किया ।
☉ 2 वर्ष, 10 माह की उम्र में गोकुल से वृन्दावन चले गये ।
☉ 4 वर्ष की आयु में वत्सासुर और बकासुर नामक राक्षसों का वध किया ।
☉ 5 वर्ष की आयु में अघासुर का वध किया ।
☉ 5 साल की उम्र में ब्रह्माजी का गर्व-भंग किया ।
☉ 5 वर्ष की आयु में कालिया नाग का मर्दन और दावाग्नि का पान किया
☉ 5 वर्ष, 3 माह की आयु में गोपियों का चीर-हरण कर उन्हें मर्यादा सभ्य आचरण की शिक्षा दी ।
☉ 5 साल 8 माह की आयु में यज्ञ-पत्नियों पर कृपा की ।
☉ 7 वर्ष, 2 माह, 7 दिन की आयु में श्री गोवर्धन जी महाराज को पूजन महत्व समझाने के लिए अपनी उंगली पर धारण कर देवराज इन्द्र को ज्ञान करवाया ।
☉ 7 वर्ष, 2 माह, 14 दिन का उम्र में भगवान श्रीकृष्ण का एक नाम ‘गोविन्द’ हुआ ।
☉ 7 वर्ष, 2 माह, 18 दिन की आयु में नन्दजी को वरुणलोक से छुड़ाकर लायें ।
☉ 8 वर्ष, 1 माह, 21 दिन की आयु में गोपियों के बालमित्रो को रासलीला नृत्य कर मर्यादा आनंद हर्ष उल्लास का निर्धारण किया ।
☉ 8 वर्ष, 6 माह, दिन की आयु में सुदर्शन गन्धर्व का उद्धार किया ।
☉ 8 वर्ष, 6 माह, दिन की उम्र में शंखचूड़ दैत्य का वध किया ।
☉ 9 वर्ष की आयु में अरिष्टासुर (वृषभासुर) और केशी दैत्य का वध करने से ‘केशव’ पड़ा ।
☉ 10 वर्ष, 2 माह, 20 दिन की आयु में मथुरा नगरी में कंस का वध किया एवं कंस के पिता नाना महाराजा श्री उग्रसेन पुनः मथुरा के सिंहासन दोबारा बैठाया ।
☉ 11 वर्ष की उम्र में अवन्तिका में सांदीपनी मुनि के गुरूकुल में मात्र 126 दिनों में छः अंगों सहित संपूर्ण वेदों, गजशिक्षा, अश्वशिक्षा और धनुर्वेद (कुल 64 कलाओं) का ज्ञान प्राप्त किया, व पञ्चजन दैत्य का वध एवं पाञ्चजन्य शंख को धारण किया ।
☉ 12 वर्ष की आयु में उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार हुआ ।
☉ ⛳ 12 से 28 वर्ष की आयु तक मथुरा में जरासन्ध को 17 बार पराजित किया ।
☉ 28 वर्ष की आयु में रत्नाकर (सिंधुसागर) पर द्वारका नगरी की स्थापना की एवं इसी उम्र में मथुरा में कालयवन की सेना का संहार किया ।
☉ 29 से 37 वर्ष की आयु में रुक्मिणी- हरण, द्वारका में रुक्मिणी से विवाह, स्यमन्तक मणि - प्रकरण, जाम्बवती, सत्यभामा एवं कालिन्दी से विवाह, केकय देश की कन्या भद्रा जी से विवाह, मद्र देश की कन्या लक्ष्मणा जी से विवाह । इसी आयु में प्राग्ज्योतिषपुर में नरकासुर का वध, नरकासुर की कैद से 16 हजार 100 कन्याओं को मुक्तकर द्वारका भेजा, अमरावती में इन्द्र से अदिति के कुंडल प्राप्त किए, इन्द्रादि देवताओं को जीतकर पारिजात वृक्ष (कल्पवृक्ष) द्वारका लाए,
नरकासुर से छुड़ायी गयी 16100 कन्याओं से द्वारका में विवाह, शोणितपुर में बाणासुर से युद्ध, उषा और अनिरुद्ध के साथ द्वारका लौटे. एवं पौण्ड्रक, काशीराज, उसके पुत्र सुदक्षिण और कृत्या का वध कर काशी दहन किया ।
☉ 38 वर्ष 4 माह 17 दिन की आयु में द्रौपदी-स्वयंवर में पांचाल राज्य में उपस्थित हुए ।
☉ 39 व 45 वर्ष की आयु में विश्वकर्मा के द्वारा पाण्डवों के लिए इन्द्रप्रस्थ का निर्माण करवाया ।
☉ 41 वर्ष की आयु में सुभद्रा- अर्जुन विवाह ।
☉73 वर्ष की उम्र में इन्द्रप्रस्थ में खाण्डव वन - दाह में अग्नि और अर्जुन की सहायता, मय दानव को सभाभवन-निर्माण के लिए आदेश भी दिया ।
☉ 75 साल की उम्र में धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ के निमित्त इन्द्रप्रस्थ में आगमन हुआ ।
☉ 75 वर्ष 2 माह की आयु में जरासन्ध के वध में भीम की सहायता की ।
☉ 75 वर्ष 3 माह की आयु में जरासन्ध के कारागार से 20 ,800 राजाओं को मुक्त किया, मगध के सिंहासन पर जरासन्ध-पुत्र सहदेव का राज्याभिषेक किया ।
☉ 75 वर्ष 6 माह की आयु में शिशुपाल का वध किया ।
☉ 75 वर्ष 7 माह की आयु में द्वारका में शिशुपाल के भाई शाल्व का वध किया ।
☉ 75 वर्ष 10 माह दिन की उम्र में प्रथम द्यूत-क्रीड़ा में द्रौपदी (चीरहरण) की लाज बचाई ।
☉ 75 वर्ष 11 माह की आयु में वन में पाण्डवों से भेंट, सुभद्रा और अभिमन्यु को साथ लेकर द्वारका प्रस्थान किया ।
☉ 89 वर्ष 1 माह दिन की आयु में अभिमन्यु और उत्तरा के विवाह में बारात लेकर विराटनगर पहुँचे ।
☉ 89 वर्ष 2 माह की उम्र में विराट की राजसभा में कौरवों के अत्याचारों और पाण्डवों के धर्म-व्यवहार का वर्णन करते हुए किसी सुयोग्य दूत को हस्तिनापुर भेजने का प्रस्ताव, द्रुपद को सौंपकर द्वारका-प्रस्थान, द्वारका में दुर्योधन और अर्जुन— दोनों की सहायता की स्वीकृति, अर्जुन का सारथी-कर्म स्वीकार करना किया ।
☉ 89 वर्ष 2 माह 8 दिन की उम्र में पाण्डवों का सन्धि-प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर गयें ।
☉89 वर्ष 3 माह 17 दिन की आयु में कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को ‘भगवद्गीता’ का उपदेश देने के बाद महाभारत-युद्ध में अर्जुन के सारथी बन युद्ध में पाण्डवों की अनेक प्रकार से सहायता की
☉ 89 वर्ष 4 माह 8 दिन की उम्र में अश्वत्थामा को 3, 000 वर्षों तक जंगल में भटकने का श्राप दिया, एवं इसी उम्र में गान्धारी का श्राप स्वीकार किया ।
☉ 89 वर्ष 7 माह 7 दिन की आयु में धर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करवाया ।
☉91-92 वर्ष की आयु में धर्मराज युधिष्ठिर के अश्वमेध-यज्ञ में सम्मिलित हुए ।
☉ 125 वे वर्ष की आयु में द्वारिका के उनके नीजी रथ चालक सारथी, व बाद में सेनापति व प्रधानमंत्री उद्धव जी को उपदेश दिया । श्री उद्धव गीता " के नाम से प्रसिद्ध हैं ।
125 वर्ष 5माह की आयु में दोपहर पर प्रभास क्षेत्र में अपने दिव्य गोलोकधाम को प्रस्थान और उसी के बाद कलियुग का प्रारम्भ हुआ ।
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उपरोक्त परंपरागत रूप से प्रचलित ज्योतिष गणना तथ्य है ।
चित्रण करने वाले चित्रकार , लैखक लैखन भाषा अनुवाद के दौरान विभिन्न प्रकार के प्रसंगों में इन तथ्यों से लाभान्वित होंगे ।
लल्ला, बालगोपाल , श्री गोपाल, श्री मुरारी, ( राधेय राधेश्याम, नाम इसलिए हुआ कि दौनो बचपन में खेलकूद के मित्र थे व बालपन में दौनो अक्सर गोकुल वृदावन के अन्य बच्चों के साथ खेलने जाय करते थे ये मात्र बचपन के मित्र थे जो भगवान के मथुरा चले जाने पर फिर कभी न मिल सके )
श्री गिरीराजधरण, श्री नाथजी महाराज,
श्री मोरमुकुटधारी , श्री मधुराधीश , श्री द्वारकाधीश , श्री कृष्ण, श्री मनमोहन, आदि नाम लीलाओं के साथ प्रसिद्ध हैं ।
रचनाकार को प्रचलित परंपरागत शास्त्रिय तथ्यो के अनुसार अपनी रचनाओं को बनाने की आवश्यकता है, ताकि अन्य अनेक जिज्ञासा के विद्वानों व भक्तों को सही दिशा में इतिहास की जानकारी पहुँचे ।
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जय भगवान श्री कृष्ण ⛳📯📯⛳⛳⛳⛳⛳⛳☉